“जमाने के जिस दौर से हम गुजर रहे हैं, अगर आप उससे वाकिफ नहीं तो मेरे अफसाने पढ़िए और अगर आप इन अफसानों को बर्दाश्त नहीं कर सकते तो इसका मतलब है कि जमाना नाकाबिल-ए-बर्दाश्त है.”
ये बात सआदत हसन मंटो ने उस वक्त कही थी जब उनपर अपनी कहानियों के जरिए अश्लीलता फैलाने के आरोप लगे. मंटो की कहानियों और उनकी बातों में वो बागी लहज़ा था, जिसे सुनकर लोग अक्सर उनसे नाराज हो जाया करते थे, पर वो तो मंटो थे, जो कभी किसी से नहीं डरा करा करते थे. उनकी आपा यानी बहन इकबाल बेगम उन्हें निड़र मंटो कहा करती थीं.
सारी जिंदगी सादत निड़र रेया…
मंटो की बहन इकबाल बेगम ने जानी मानी पाकिस्तानी पत्रकार और राजनीतिज्ञ जुगनू मोहसिन को दिए अपने एक इंटरव्यू में अपने भाई सआदत हसन मंटो के बारे में खुलकर बात की थी. जुगनू बताती हैं कि जब उन्होंने इकबाल बेगम से कहा कि “बेगम साहिबा, आप अपने भाई को चंद अल्फाज़ में बयां कर सकें तो आप क्या कहेंगी”?
तो इस पर इकबाल बेगम ने पंजाबी में कहा- “कि सआदत दी ये गल सी कि वो निड़र सी… बिल्कुल निड़र सी… सारी जिंदगी सादत निड़र रेया… (सआदत की ये बात थी को वो निड़र था. बिल्कुल निड़र था. सारी जिंदगी सआदत निड़र रहा था.)”
यह बात जुगनू ने मंटो के दामाद शाहिद जलाल के साथ किए गए एक इंटरव्यू में बताई थी. जब जुगनू ने मंटो के निड़र होने की बात कही तो शाहिद बोले कि मंटो का एक किस्सा बहुत मशहूर है…
शाहिद ने कहा- “मंटो जब नौ वर्ष के थे, तब उन्होंने ऐसा कारनामा कर दिखाया था, जिसकी किसी ने कल्पना भी नहीं की थी. जब वो अमृतसर में थे, तब उस जमाने में हिंदुओ का कोई त्यौहार था, जिसमें आग जलाते हैं और उसपर वे चलते हैं. वहां एक मदारी था, जिसने बोला कि कौन मेरे पीछे चलेगा? और अब्बा जी (मंटो) अपनी सलवार ऊपर करके उनके पीछे आग में चल पड़े. नौ साल की उम्र में… और उन्हें कुछ नहीं हुआ.”
मंटो की जिंदगी के आखिरी लम्हे
इस दौरान शाहिद जलाल, जो मंटो के दामाद और भतीजे होने के साथ-साथ एक नामी चित्रकार रहे हैं, उन्होंने मंटो की मौत से हफ्ते भर पहले के लम्हों का भी जिक्र किया. उन्होंने बताया कि उनके पिता हामिद जलाल ने एक आर्टिकल लिखा था, जिसमें उन्होंने उन्हें एक गद्दार की उपाधि दी थी. शाहिद ने बताया कि आखिर उन्हें उनके पिता द्वारा आर्टिकल में गद्दार क्यों कहा गया था?
शाहिद ने कहा- मंटो मामू की मौत से एक हफ्ता पहले… मैं बाहर खेल रहा था. उस समय हमारे बाथरूम बाहर की तरफ खुला करते थे. वो बाथरूम से निकले तो उन्होंने खून की उल्टी कर दी. बहुत सारा खून था. लीवर सेरोसिस के कारण… वे फर्श पर पड़े खून को साफ कर रहे थे और उन्होंने मेरी तरफ देखा और पंजाबी में कहा- “किसी से कहना मत, वरना मुझसे बुरा कोई नहीं होगा. पर मैंने उनकी एक न सुनी और मैं घर के अंदर गया और सभी को बता दिया. इसके बाद एम्बुलेंस आई और उन्हें ले गए. हफ्ते बाद उनकी मौत हो गई.”
शाहिद जलाल ने जिस तरह से इस किस्से का जिक्र किया, ये बताता है कि अपनी जिंदगी के आखिरी लम्हों में भी मंटो कितना निड़र थे. मौत सिर पर खड़ी थी, लेकिन वे नहीं चाहते थे कि घर में किसी को भी उनकी बीमारी के बारे में पता चले.
सआदत हसन मंटो के ऐसे न जाने कितने ही किस्से हैं, जिन्हें भुलाया नहीं जा सकता. मंटो को मानवीय पहलुओं पर जोर देने वाला लेखक कहा जाता था. उनकी कहानियों में गरीबों के लिए सम्मान नजर आता था. उनकी लिखाई बहुत ही रिच थी. वह जमाने से आगे की सोच रखते थे. मंटो का मानना था कि मनुष्य का कोई ब्रांड नहीं होता. वे किसी भी मजहब को मनुष्य से ऊपर रखने से परहेज करते थे.
अपने लेखन के लिए उन्हें आलोचनाएं और मुकदमों का भी सामना करना पड़ा, पर उन्होंने न अपने लिखने का तरीका बदला और न कभी किसी से डरे. जब उनकी कहानियों को अश्लील और गंदा बताया गया तब उन्होंने कहा था- “अगर आपको मेरी कहानिया गंदी लगती हैं, तो जिस समाज में आप रहते हैं वह गंदा है. अपनी कहानियों के जरिए मैं सिर्फ सच का खुलासा करता हूं.”
विभाजन का दर्द
सबसे ज्यादा दर्द मंटो को भारत और पाकिस्तान के विभाजन का था. विभाजन को मंटो एक पागलपन कहा करते थे. उनका कहना था- “ये मत कहो कि एक लाख हिंदू और एक लाख मुसलमानों का कत्ल कर दिया गया. ये कहो कि 2 लाख इंसानों की बलि दे दी गई.”
मंटो ने विभाजन की अपनी कहानियों में कई वीभत्स घटनाओं का जिक्र भी किया है. मंटो तो चले गए लेकिन उनकी कहानियों के जरिए आज भी वे अपने चाहने वालों के बीच जीवित हैं. अगर आप भी उनकी कहानियां पढ़ना चाहते हैं तो काली सलवार, ठंडा गोश्त, टेटवाल का कुत्ता, टूबा टेक सिंह, आखिरी सैल्यूट, माई नानकी, बू, खोल दो… जैसी कहानियों को पढ़ा जा सकता है.
(सआदत हसन मंटो की यह तस्वीर गूगल से ली गई है)
